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कहीं हमारी गलतियों की सजा अगली पीढ़ियों को न झेलना पड़े


Pradeep-kumar-singh
राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस प्रत्येक वर्ष भारत में 2 दिसम्बर को मनाया जाता है। यह दिवस उन लोगों की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने भोपाल गैस त्रासदी में अपनी जान गँवा दी थी। उन मृतकों को सम्मान देने और याद करने के लिये भारत में हर वर्ष इस दिवस को मनाया जाता है। भोपाल गैस त्रासदी वर्ष 1984 में 2 और 3 दिसंबर की रात में शहर में स्थित यूनियन कार्बाइड के रासायनिक संयंत्र से जहरीला रसायन, जिसे मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) के रूप में जाना जाता है, के साथ-साथ अन्य रसायनों के रिसाव के कारण हुई थी। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ये घोषित किया गया कि गैस त्रासदी से संबंधित लगभग 3,787 लोगों की मृत्यु हुई थी। अगले 72 घंटों में लगभग 8,000-10,000 के आसपास लोगों की मौत हुई, वहीं बाद में गैस त्रासदी से संबंधित बीमारियों के कारण लगभग 25,000 लोगों की मौत हो गयी। ये पूरे विश्व में इतिहास की सबसे बड़ी औद्योगिक प्रदूषण आपदा के रूप में जाना गया। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक आपदा के प्रबंधन और नियंत्रण के लिए जागरूकता फैलाना तथा प्रदूषण रोकने के लिए प्रयास करना है। इस त्रासदी में जान गवाने वाले लोगों के लिए विशेष श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है। इसके साथ ही इस दिन गैर सरकारी संगठनों, सिविल सोसायटी और नागरिकों द्वारा प्रदूषण को रोकने के लिए संगोष्ठी, भाषण कार्यक्रम जैसे कई सारे कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। 2 दिसंबर के दिन भोपाल, कानपुर, दिल्ली और मुबंई जैसे शहरों में जन-जागरूकता रैली निकाली जाती है राष्ट्रीय प्रदूषण दिवस को देखते हुए प्रदूषण नियंत्रण की देखरेख करने वाली संस्था भारतीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए इस मौके पर 2 दिसंबर के दिन भोपाल, कानपुर, दिल्ली और मुबंई जैसे शहरों में जन-जागरूकता रैली निकाली जाती है जिसमें लोगों को बढ़ते प्रदूषण और प्रतिकूल प्रभावों के प्रति आगाह किया जाता है। इस दिन जन जागरूकता रैली निकालना काफी महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में भारत के 14 शहर शामिल हैं। इस रैली में लोगों को बढ़ते प्रदूषण के कारण पर्यावरण में हो रहे जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के बढ़ते तापमान जैसे विषयों के बारे में बताया जाता है तथा इस बात पर चर्चा की जाती है कि कैसे छोटे-छोटे उपायों को अपनाकर हम प्रदूषण को रोकने में अपना अहम योगदान दे सकते हैं। प्रदूषण न‍ियंत्रण पर काम कर रही हैं ये प्रमुख हस्त‍ियां सुश्री गौरा देवी के नेतृत्व में उत्तराखंड के जंगलों को वन माफिया से बचाने के लिए 1970 की शुरूआत में गढ़वाल के ग्रामीणों ने अहिंसात्मक तरीके से एक अनूठी पहल करते हुए पेड़ों से चिपककर हजारों-हजार पेड़ों को कटने से बचाया। यह अनूठा आंदोलन ‘चिपको आंदोलन’ नाम से प्रसिद्ध हुआ था। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सुश्री वंगारी मथाई केन्याई पर्यावरणविद् और राजनीतिक कार्यकर्ता थीं। यह महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली महान महिला के रूप में प्रसिद्ध है। उन्होंने अमेरिका और कीनिया में उच्च शिक्षा अर्जित की। 1970 के दशक में मथाई ने ग्रीन बेल्ट आंदोलन नामक गैर सरकारी संगठन की नींव डालकर पौधारोपण, पर्यावरण संरक्षण और महिलाओं के अधिकारों की ओर ध्यान दिलाया। सुश्री मेधा पाटकर एक भारतीय पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता तथा समाज सुधारक है। मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक के नाम से भी जानी जाती है। श्रीमती मेनका गांधी प्रसिद्ध राजनेत्री, जानी-मानी पर्यावरणवादी एवं पशु-अधिकारवादी हैं। भारत में पशु-अधिकारों के प्रश्न को मुख्यधारा में लाने का श्रेय श्रीमती मेनका गांधी को ही जाता है। विश्व-विख्यात पर्यावरणविद् एवं नवधान्य की संस्थापक-निदेशक, डा. वंदना शिवा जैविक खेती पर ज्यादा जोर देती हैं और देश भर के किसानों को जागरूक कर रही हैं। देहरादून में जन्मीं 58 साल की डा. वंदना शिवा ने पर्यावरण पर दो दर्जन किताबें लिखी हैं। 1970 में वंदना शिवा चिपको आंदोलन से जुड़ी थीं। उसके बाद तो पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई और वंदना शिवा एक दूसरे के पर्याय बन गए। सुश्री सुनीता नारायण भारत की प्रसिद्ध पर्यावरणविद् है। सुनीता नारायण सन 1982 से विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र से जुड़ी हैं। वर्तमान में वह केंद्र की निदेशक हैं। वे पर्यावरण संचार समाज की निदेशक भी हैं। वे डाउन टू अर्थ नाम की एक अंग्रेजी पत्रिका भी प्रकाशित करती हैं जो पर्यावरण पर केंद्रित है। ग्रीन मैन के नाम से विख्यात हरित ऋषि श्री विजय पाल बघेल का मानना है कि पर्यावरण और जीवन का अनोखा संबंध है। पर्यावरण का ध्यान रखना हर किसी की जिम्मेदारी और अधिकार होना चाहिए। श्री चंडीप्रसाद भट्ट भारत के गांधीवादी, पर्यावरणवादी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्हांेने सन् 1964 में उत्तराखण्ड के गोपेश्वर में दशोली ग्राम स्वराज्य संघ की स्थापना की जो कालान्तर में चिपको आंदोलन की मातृ-संस्था बनी। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डा. सौम्या दत्ता का नाम देश के अलग-अलग हिस्सों में विनाशकारी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का विरोध करने वालों की अग्रिम पंक्ति में आता है। पर्यावरणविद् डा. रविकान्त पाठक वर्तमान में स्वीडन की गोथम्बर्ग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के रूप में जलवायु परिवर्तन तथा वायुमण्डलीय विषय पर गहन रिसर्च कर रहे हैं। भारतीय किशोरी युगरत्ना श्रीवास्तव ने संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मेलन के माध्यम से दुनिया के दो अरब पचास करोड़ से अधिक बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए विश्व के राजनेताओं से पूछ ही लिया कि ‘‘ये कैसा इंसाफ है कि हमें धरती अच्छी हालत में मिले लेकिन हम उसे आने वाली पीढ़ी के लिए खराब हालत में दें?’’ भारत ही विश्व में एकता तथा शान्ति स्थापित करेगा हमारा मानना है कि युद्धों तथा आतंकवाद से धरती को बचाने के लिए भारत को अपनी संस्कृति के आदर्श वसुधैव कुटुम्बकम् तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुरूप एक वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था (विश्व संसद) गठित करने लिए सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक शीघ्र बुलानी चाहिए। साथ ही मानव निर्मित तथा प्राकृतिक अपदाओं से सामाजिक सुरक्षा प्रत्येक वोटर को प्रदान करने के लिए वोटरशिप अधिकार कानून की अविलम्ब आवश्यकता है! वोटरशिप कानून के अन्तर्गत प्रत्येक वोटर को उसके हिस्से की आधी धनराशि उसके खाते में भेजने की मुहिम विश्व परिवर्तन मिशन के संस्थापक विश्वात्मा भरत गांधी द्वारा देश में जोरदार तरीके से चलाया जा रहा है। भारत सरकार को उनके द्वारा भारतीय संसद में दायर याचिका पर चर्चा करवानी चाहिए।   लेखक: प्रदीप कुमार सिंह, विश्व परिवर्तन मिशन, लखनऊ The post कहीं हमारी गलतियों की सजा अगली पीढ़ियों को न झेलना पड़े appeared first on Legend News.
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