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सुप्रीम कोर्ट बताएगा, कब बालिग होती है मुस्लिम लड़की


नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है, जिसमें एक नाबालिग मुस्लिम लड़की ने कहा है कि उसने मुस्लिम कानून के हिसाब से निकाह किया है। वह प्यूबर्टी (रजस्वला) की उम्र पा चुकी है और अपनी जिंदगी जीने को आजाद है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को लड़की ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हाई कोर्ट ने लड़की की शादी को शून्य करार देते हुए उसे शेल्टर होम में भेजने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा गया कि वह शादीशुदा है और ऐसे में उसे दांपत्य जीवन बसर करने की इजाजत दी जाए।
यह मामला यूपी के अयोध्या का है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस अजय रस्तोगी की बेंच ने मामले में दाखिल अर्जी पर सुनवाई के दौरान मामले में सुनवाई के लिए सहमति देते हुए यूपी सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है।
हाई कोर्ट ने शादी को दिया शून्य करार
दरअसल, लड़की की उम्र 16 साल बताई गई। इसके बाद अयोध्या की निचली अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि लड़की चूंकि नाबालिग है ऐसे में उसे शेल्टर होम भेजा जाए। लड़की ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अर्जी दाखिल कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता लड़की नाबालिग है और वह अपने पेरेंट्स के साथ नहीं रहना चाहती लिहाजा उसे शेल्टर होम में भेजने का आदेश सही है। साथ ही हाई कोर्ट ने शादी को शून्य करार दे दिया।
लड़की की दलील
इस लड़की ने अपनी याचिका में कहा है कि मुस्लिम कानून के तहत लड़की के रजस्वला की आयु, (जो 15 वर्ष है) के होने पर वह अपनी जिंदगी के बारे में निर्णय लेने के लिये स्वतंत्र है और अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से शादी करने में सक्षम है। इस लड़की ने अपने वकील दुष्यंत पाराशर के माध्यम से दायर याचिका में कहा है कि हाई कोर्ट इस तथ्य की सराहना करने में विफल रहा कि उसका निकाह मुस्लिम कानून के अनुसार हुआ है। याचिका में लड़की ने अपने जीने और स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करने का अनुरोध करते हुये दलील दी है कि वह एक युवक से प्रेम करती है और इस साल जून में मुस्लिम कानून के अनुसार उनका निकाह हो चुका है।
पिता ने दर्ज कराया था अपहरण का केस
लड़की के पिता ने पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत में कहा कि एक युवक और उसके साथियों ने उसकी बेटी का अपहरण कर लिया है। हालांकि, लड़की ने मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए अपने बयान में कहा है कि उसने एक व्यक्ति से अपनी मर्जी से शादी की है और वह उसके ही साथ रहना चाहती है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द कर दी थी याचिका
बता दें कि यूपी की बहराइच की एक अदालत ने 24 जून को अपने फैसले में कहा था कि लड़की की शादी की उम्र नहीं हुई है। कोर्ट ने लड़की को 18 साल की उम्र पूरी करने तक बाल कल्याण कमिटी, बहराइच के पास भेज दिया था। बाद में लड़की के पति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के सामने बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका दाखिल की थी। बेंच ने लड़की के पति की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि जूवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रॉटेक्शन) ऐक्ट के तहत लड़की को नाबालिग माना जाएगा और यह शादी अमान्य है। हाई कोर्ट निचली अदालत के फैसले से सहमति जताते हुए लड़की को वूमन शेल्टर होम भेज दिया था।
शाफीन जहां केस के फैसले की दलील
लड़की के वकील पराशर ने शाफीन जहां केस का हवाला दिया। शाफीन के केस में सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में कहा था कि जीवन साथी चुनने का अधिकार संविधान देता है। पराशर ने कोर्ट में दलील दी कि लड़की के पिता उसके जीवन साथी के साथ रहने से रोक रहे हैं। पराशर ने दावा किया कि लड़की ने रजस्वला की उम्र पार करने और वैध निकाहमाना के साथ के लड़के से शादी की है।
-एजेंसियां

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