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Mauritius की महिला ने यूनेस्को विरासत सूची में दर्ज कराए भोजपुरी लोकगीत


उत्तर प्रदेश के लोकरंग 2019 और गिरमिटिया महोत्सव में भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन Mauritius की प्रेसिडेंट डॉ. सरिता ने भी हिस्सा लिया। डॉ. सरिता अपनी 24 सदस्यीय महिला टीम (गीत-गवाई) के साथ इस कार्यक्रम में भाग लेने Mauritius से भारत आईं।
इस समारोह में डॉक्टर सरिता ने कहा, भारत के अलावा विश्व के 13 देशों में बोली जाने वाली भोजपुरी अपना पुराना और गरिमामय इतिहास की वजह से लोकप्रिय हो रही है। हालांकि, भारत में भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा अब तक नहीं मिला है।
उन्‍होंने बताया कि मैं भोजपुरी भाषा को लेकर अपनी पढ़ाई के दिनों से ही सक्रिय रही हूं। मुझे अपनी मातृ भाषा के लिए कुछ विशेष करना था। सन 1967 में जब स्वामी कृष्णानंद जी महाराज मॉरीशस आये तो मैं उनसे खास प्रभावित हुई। उस समय शिवसागर रामगुलाम जी मॉरीशस की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे। 1968 में मॉरीशस आजाद हुआ और मेरी भोजपुरी को लेकर सक्रियता बढ़ गई। स्वामी कृष्णानद जी ने मुझे प्रेरित किया।
कृष्णानद जी ने मुझे अपनी संस्कृति और भाषा को लोगों तक पहुंचाने और प्रचलित करने की दिशा में कार्य करने की सलाह दी। तब मैं भूगोल की शिक्षिका थी। मैं शाम के समय गांवों में जाकर लोगों को भोजपुरी के प्रति जागरूक करती।
लोकगीत जो अक्सर घरों में औरतें गाती या पुरुष जो उत्सवों में या चौपालों में गाते उसको नई पीढ़ी के जीवन में भी स्थान मिले ऐसा मैं किया करती। मुझे मेरे पति भी इस काम में मदद करते। 1982 में मैंने मॉरिशस भोजपुरी इंस्टिट्यूट की स्थापना की जिसके अंतर्गत मैं भोजपुरी के प्रचार प्रसार में कई आयोजन और प्रशिक्षण शिविर लगाने लगी।
मैं पैदा मॉरिशस में ही हुई लेकिन मेरे पूर्वज बलिया उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। जब मैं अपनी जड़ के बारे में पता कर रही थी तो मुझे पता चला कि मेरे परदादा के पिता जवानी में ही यहां काम करने आये थे। 2 नवम्बर 1834 को पहली बार 35 मजदूरों की टोली कॉन्ट्रैक्ट पर मॉरिशस गयी, यह वो दौर था जब दास प्रथा की विश्वभर में आलोचना हो रही थी और इंग्लैंड ने सबसे पहले इस पर रोक लगाई। भारत के भोजपुरी क्षेत्र और दक्षिण भारत से भी लोग वहां काम करने के लिए गए फिर वहीं के होकर रह गए।
भोजपुरी में लोग एग्रीमेंट को ‘गिरमिट’ अपभ्रंश शब्द से बुलाते थे। इसलिए इन मजदूरों को बाद में गिरमिटिया मजदूर कहा जाने लगा। मैंने अपनी उच्च शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से ही पूरी की। यहीं से हमारे पूर्वज जहाज से मॉरिशस गन्ने की खेती करने आये थे. मॉरिशस में लोगों ने अब भी अपने पूर्वजों के द्वारा लाई गई संस्कृति बचा कर रखी है.
जब सरिता से यह पूछा गया कि यूनेस्को ने आपकी ‘गीत गवाई’ संस्था को मानवता की विरासत सूची में शामिल किया, इसके बारे में कुछ बताएं, तो उनका कहना था-
यूनेस्को को जब हमारी सरकार और हमने अपनी संस्था के लिए आवेदन भेजा तो उन्होंने पूछा की आप ये लोकगीत किस भाषा में गाते हैं और दर्ज करते हैं। हमने कहा भोजपुरी भाषा में और हमारी लिपि देवनागरी है। उन्होंने हमें भोजपुरी भाषा को भी आगे बढ़ाने की कवायद करने के निर्देश दिए क्योंकि तभी उस भाषा के लोक गीत प्रचलित होते रहेंगे।
जब भाषा का विकास होगा और साथ ही हमें युवापीढ़ी में भी इन लोकगीतों को लेकर रुचि जगाने को कहा गया। मैं बड़ी ख़ुशी के साथ कह सकती हूं कि हम इस दिशा में अग्रसर हैं और सफल भी हुए हैं, मॉरिशस में युवा भोजपुरी लोकगीत को लेकर अपनी रुचि दिखा रहे हैं।
-एजेंसियां

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