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#Mentoo: सिर्फ महिलाओं के नजरिए से नहीं सोचा जाना चाहिए


पिछले 10 साल से पुरुष अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली सोशल ऐक्टिविस्ट बरखा त्रेहन बता रही हैं कि किस तरह रेप और यौन शोषण जैसे मामलों में लैंगिक समानता यानी जेंडर इक्वैलिटी को नजरअंदाज किया जाता है और पुरुषों पर आरोप लगते ही उन्हें दोषी मान लिया जाता है…
करीब 10 साल पहले मेरे एक फ्रेंड पर रेप का इल्जाम लगा था। उस वक्त तक मुझे भी यही लगता था कि पुरुष ही दोषी होते हैं लेकिन उसने सच बताया। मैंने उसके परिवार से बात की, कई बार बातचीत के बाद और थोड़ी रिसर्च से साफ हुआ कि किसी सामान को लेकर उसका झगड़ा हुआ था और लड़की ने उस पर रेप जैसा गंभीर इल्जाम लगा दिया। मैं उसके पक्ष में खड़ी हुई और हमने फाइट की। बाद में वह आरोपमुक्त हो गया लेकिन उस वाकये से मुझे झटका लगा। तब से मैंने पुरुषों के हक में बोलना शुरू किया। सभी पुरुष रेपिस्ट नहीं होते, फर्जी मामले बहुत बड़ी तादाद में आ रहे हैं।
पुरुषों का चरित्र हनन क्यों?
पिछले साल एक बड़ी कंपनी के वाइस प्रेसीडेंट पर यौन शोषण का इल्जाम लगा। कंपनी ने उनकी बात सुने बिना उन्हें सस्पेंड कर दिया। सिर्फ आरोप के आधार ही दोषी मान लिया गया? 18 दिसंबर 2018 को उन्होंने खुदकुशी कर ली। जिस व्यक्ति ने कंपनी को 17 साल दिए और वहां से तारीफें पाईं, उसके खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं आई थी, पर एक इल्जाम ने उसकी जिंदगी भर की इज्जत छीन ली। वह सही या गलत कोर्ट में साबित होता लेकिन समाज में उसका सम्मान खत्म हो चुका था। ऐसा तो नहीं कि हर पुरुष रावण है और स्त्रियां सीता। यह कोई नहीं सोचता कि पुरुषों द्वारा आत्महत्या के मामले बढ़ क्यों रहे हैं। आप देखें कानून का गलत इस्तेमाल करते हुए किसी ने रेप का तो किसी ने सेक्शुअल हरैसमेंट का इल्जाम लगा दिया। नहीं तो घरेलू हिंसा या दहेज प्रताड़ना के केस में फंसा दिए जाते हैं। दिल्ली के तिलक नगर के एक मामले में तो सड़क पर खड़े एक लड़के पर ट्रैफिक सिग्नल पर ही यौन शोषण का इल्जाम लग गया। लड़की विदेश चली गई है और लड़का कोर्ट के चक्कर काट रहा है। कई केसेज में सिर्फ आरोप रह जाते हैं, बाद में सुबूत नहीं मिलता और कोर्ट बरी कर देती है लेकिन आरोप मुक्त कर देने तक उनकी जिंदगी में बहुत कुछ बदल जाता है। रेप केस कराने वाली लड़की को सरकार कानूनी सुविधाएं भी दे देती है पर लड़के का क्या? उसका मान-सम्मान तो खत्म हो जाता है। कई मामलों में 13-14 साल बाद बाइज्जत बरी किए गए हैं लोग। अब सोचिए तब तक उनकी जिंदगी कैसी हो गई होगी। घर कैसे चलाया होगा? एक शख्स को तो अपना हमनाम होने की सजा मिली। पुलिस ने उसे ही आरोपी समझ लिया था, मुंबई के उस केस में पुरुष ने कोर्ट में साबित किया कि वह असल आरोपी नहीं है, कोर्ट ने बरी किया और तब उसने मानहानि का मुकदमा भी किया लेकिन उसका चरित्र हनन तो गया था।
करण का केस है उदाहरण
आज अगर ऐक्टर करण ओबेरॉय को जानने वाले इतने लोग उनके पक्ष में आ रहे हैं तो यह समझ सकते हैं कि #Mentoo मूवमेंट कितना जरूरी हो गया है। कोई भी उठकर किसी पर भी बिना सबूत इल्जाम लगा देता है। अगर #Metoo जरूरी था तो इसे भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। करण का पक्ष जाने बिना उन्हें जेल भेज दिया गया। उनकी इमेज को धक्का लगा है। कल को अलग वह बरी हो जाते हैं तो उनका मान-सम्मान कहां से लौटेगा? उन्हें रेपिस्ट कहा जा रहा है जबकि करण द्वारा मुहैया कराए गए मेसेज से साफ है कि लड़की की ओर से जबरदस्ती हो रही थी। मुझे तो लगता है कि यह मेल रेप के केस हैं। करण लगातार मना कर रहे थे कि मुझे अपने करियर पर ध्यान देना है और लेकिन लड़की उनके पीछे पड़ी थी। इससे पहले ऐसे बहुत से मामले सामने आ चुके हैं जब जल्दबाजी में लड़कियों की शिकायत को सच मान लिया गया और बाद में लड़कों के खिलाफ सबूत नहीं मिले। रोहतक की बहादुर बहनों का केस सबको याद होगा उस केस में लड़कों को कोर्ट से दो बार आरोपमुक्त किया गया लेकिन अब भी समाज में ऐसे लोग हैं जो उन्हें ही दोषी समझते हैं। मर्द को भी दर्द होता है, यहां जेंडर इक्वैलिटी का ध्यान रखना चाहिए। सब-कुछ सिर्फ महिलाओं के नजरिए से नहीं सोचा जाना चाहिए। अगर आरोप लगाने वाली महिला की पहचान गुप्त रखी जाती है तो आरोपी की पहचान भी दोषी साबित होने तक सामने नहीं आनी चाहिए।
इसलिए पुरुष आयोग बनाने की मांग
आंकड़े बताते हैं कि आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की तादाद महिलाओं से दोगुनी है। झूठे आरोप लगना और फैमिली इशू ही इसके पीछे जिम्मेदार होते हैं। पुरुष पर आरोप गलत साबित हों तब भी झूठे आरोप लगाने वाली महिलाओं को इस्तीफा देने को नहीं कहा जाता। कानून बराबर होना चाहिए, सहमति से बनाए संबंधों को बाद में रेप कह देना आसान है। लोग कहते हैं आपका शहर रेप कैपिटल लेकिन मुझे लगता है कि यह सुइसाइड कैपिटल जरूर है। कोर्ट में 3.5 करोड़ केस पेंडिंग हैं। क्या पुरुषों को इज्जत से रहने का हक नहीं हैं। चीफ जस्टिस पर इल्जाम लगे तो 17 दिन में केस खत्म हो गया लेकिन आम नागरिक का सोचें वह कहां शिकायत करे इसलिए पुरुष आयोग हो जो महिला आयोग की तरह पुरुषों के हक में पॉलिसी बनाए। ब्रेस्ट कैंसर पर अवेयरनेस अच्छी बात है पर प्रॉस्टेंट कैंसर पर भी बात होनी चाहिए।
कानून का गलत इस्तेमाल न हो
निर्भया केस के बाद रेप से जुड़े कानून में कई बडे़ बदलाव हुए लेकिन क्राइम अगेंस्ट वुमन कम नहीं हुआ। झूठे केसेज बहुत आए। एक सर्वे ने बताया कि दुनिया के प्रताड़ित पुरुषों में तीसरे नंबर पर भारतीय पुरुष हैं। जब तक कानून जेंडर न्यूट्रल नहीं होंगे तो पुरुषों से बदला लेने के लिए या आगे बढ़ने का अपना रास्ता साफ करने के लिए उनपर झूठे इल्जाम लगने बंद नहीं होंगे। प्रॉपर्टी के केस में भी धड़ल्ले से रेप केस होते हैं। पुरुषों को जन्म देने वाली महिलाएं कमजोर नहीं हैं। जरूरी है कि हम यूथ को सशक्त बनाएं और सोसायटी में बैंलस बनाएं। बेटी बचाओ और बेटा मरवाओ तो नहीं चलेगा, बेटी भी बचाओ और बेटा भी बचाओ।
-एजेंसियां

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